राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० के छह वर्ष: आँकड़े क्या कहते हैं
पिछले वर्ष भारत के विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या पहली बार एक करोड़ के पार पहुँची।
उसी वर्ष देश में ९.८३ लाख स्वीकृत शिक्षक पद रिक्त पड़े थे।
दोनों आँकड़े सही हैं। और इन्हीं दोनों के बीच राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० की पूरी कहानी छिपी है।
छह वर्ष पहले जब १९८६ की नीति के स्थान पर नई शिक्षा नीति आई थी, तब चर्चा संभावनाओं की थी। आज हमारे पास प्रमाण हैं। मैं इस लेख में वही करना चाहता हूँ जो वर्षगाँठ के अवसर पर प्रायः नहीं किया जाता — उपलब्धियों और असफलताओं को एक ही पृष्ठ पर रखना, बिना किसी को छोटा किए।
हमारे क्षेत्र में हर सुधार को दिखावा कह देने की एक आदत बन गई है। आँकड़े इस निराशावाद का समर्थन नहीं करते।
उच्च शिक्षा में पहुँच सचमुच बढ़ी है। जुलाई २०२६ में जारी अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार २०२३-२४ में नामांकन ४.५० करोड़ तक पहुँचा और सकल नामांकन अनुपात पहली बार ३० के पार गया — जो २०१४-१५ में २३.७ था। एक दशक में १.०८ करोड़ विद्यार्थी जुड़े।
बेटियाँ अब पीछे नहीं, आगे हैं। महिला सकल नामांकन अनुपात ३१.२ है — राष्ट्रीय औसत से अधिक। विज्ञान और तकनीकी विषयों में महिलाओं की भागीदारी ४४ प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। दशकों तक हम बेटियों के प्रवेश पर बहस करते रहे; आज चर्चा उनकी श्रेष्ठता की है। यह छोटी बात नहीं है।
बुनियादी शिक्षा में सुधार दिख रहा है। असर २०२४ के अनुसार सरकारी विद्यालयों में कक्षा ३ के जो बच्चे कक्षा २ स्तर का पाठ पढ़ सकते थे, उनका प्रतिशत २०२२ के १६.३ से बढ़कर २०२४ में २३.४ हो गया। निपुण भारत और एनईपी की बुनियादी साक्षरता पर केंद्रित दृष्टि का श्रेय यहाँ बनता है। पहली बार पूरा देश एक ही दिशा में चल रहा है।
वैश्विक पहचान बढ़ी है। क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग २०२६ में ५४ भारतीय संस्थान शामिल हैं, जो २०२१ में २८ थे।
जिन प्राचार्यों और शिक्षकों ने छह वर्ष पाठ्यक्रम बदलने, प्रशिक्षण लेने और अभिलेख तैयार करने में लगाए हैं — उनका परिश्रम आँकड़ों में दिखता है। इसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
अब कठिन भाग।
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तीन कमियाँ जो नीति की भाषा से नहीं भरतीं
१. धन कभी आया ही नहीं
एनईपी २०२० की सबसे महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता ५+३+३+४ ढाँचा नहीं थी। वह थी — जीडीपी का ६ प्रतिशत शिक्षा पर।
छह वर्ष बाद यह व्यय लगभग २.४ प्रतिशत पर टिका है।
केंद्रीय शिक्षा बजट अवश्य बढ़ा — २०२५-२६ में १.२८ लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड स्तर, २०१८ की तुलना में लगभग ६४ प्रतिशत अधिक। समग्र शिक्षा, पीएम श्री, निपुण भारत, पीएम-उषा और दीक्षा जैसी योजनाओं में तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक व्यय हुआ। ये राशियाँ मामूली नहीं हैं।
किंतु शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है और बड़ा भार राज्यों पर है। केंद्रीय बजट बढ़ने के बावजूद जीडीपी अनुपात का स्थिर रहना बताता है कि राष्ट्रीय प्रयास उस महत्वाकांक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ा।
आप २.४ प्रतिशत की व्यवस्था चलाकर ६ प्रतिशत की नीति के मानकों पर मूल्यांकन नहीं कर सकते।
२. शिक्षक पहले से अधिक हैं, वितरण पहले से बदतर
एक करोड़ शिक्षकों की उपलब्धि के साथ ये आँकड़े प्रायः एक साथ नहीं छपते:
९.८३ लाख स्वीकृत शिक्षक पद रिक्त हैं। २०२३-२४ से २०२४-२५ के बीच स्वीकृत पद ६३.२६ लाख से बढ़कर ६९.८६ लाख हुए — किंतु रिक्तियाँ भी ९.५९ लाख से बढ़कर ९.८३ लाख हो गईं। हम पद भरने से तेज़ गति से पद बना रहे हैं।
अनुमानतः १०-१२ लाख शिक्षक उस स्तर के लिए निर्धारित योग्यता नहीं रखते जिस स्तर पर वे पढ़ा रहे हैं।
एक लाख से अधिक विद्यालय आज भी एकल शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। जहाँ एक ही शिक्षक हो, वहाँ आंशिक रिक्ति जैसी कोई स्थिति नहीं होती।
उच्च शिक्षा में केंद्रीय संस्थानों में रिक्तियाँ २८.५६ प्रतिशत, प्राध्यापक स्तर पर ५६.१८ प्रतिशत, और कई राज्य विश्वविद्यालयों में ६० प्रतिशत से ऊपर हैं।
एनसीटीई — जो शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता का नियामक है — स्वयं अपने ५४ से ८९ प्रतिशत पद रिक्त रखकर काम कर रहा है।
अंतिम बिंदु दोबारा पढ़िए। जिस संस्था पर शिक्षक गुणवत्ता की ज़िम्मेदारी है, वह स्वयं अपने पद नहीं भर पा रही।
आईआईटी प्रणाली ने सितंबर २०२२ से मई २०२६ के बीच ३,५०० से अधिक संकाय पद भरे — इससे सिद्ध होता है कि मिशन मोड में काम हो तो परिणाम आते हैं। प्रश्न यह है कि वही तत्परता राज्य विश्वविद्यालयों और ज़िला विद्यालयों तक क्यों नहीं पहुँची।
व्यावहारिक निष्कर्ष: एनईपी की बाधा अब पाठ्यक्रम की रूपरेखा नहीं है। बाधा मानव संसाधन है। आधे रिक्त विभाग में अतिथि शिक्षकों के सहारे चलाया गया चार-वर्षीय स्नातक कार्यक्रम वह सुधार नहीं है जिसकी नीति ने कल्पना की थी। वह पुरानी व्यवस्था है, नए अभिलेखों में लिपटी हुई।
३. हम अंधेरे में शासन करते हैं और उसे प्रमाण-आधारित नीति कहते हैं
२०२२-२३ और २०२३-२४ की एआईएसएचई रिपोर्टें जुलाई २०२६ में एक साथ जारी हुईं।
इसका अर्थ समझिए। जनवरी २०२६ में संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण को २०२१-२२ के आँकड़ों पर निर्भर रहना पड़ा — यानी चार वर्ष पुराने आँकड़े। एनईपी २०२० सकल नामांकन अनुपात की वार्षिक निगरानी अनिवार्य करती है। चार वर्ष के अंतराल पर वार्षिक निगरानी संभव नहीं है।
एक सुधार यहाँ लगभग निःशुल्क है: एआईएसएचई और यूडाइस+ के लिए छह माह की अधिकतम प्रकाशन सीमा वैधानिक रूप से तय कर दी जाए। विलंबित आँकड़ा तटस्थ नहीं होता — वह खराब प्रदर्शन को जाँच से बचाता है।
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५० प्रतिशत का गणित
एनईपी २०२० का लक्ष्य है — २०३५ तक उच्च शिक्षा में ५० प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात। हम ३० पर हैं, और ६.३ अंक बढ़ाने में एक दशक लगा।
सहज प्रतिक्रिया होती है — और विश्वविद्यालय खोलो। गणित कुछ और कहता है।
उच्च शिक्षा का नामांकन अनुपात उच्चतर माध्यमिक में ठहराव से बँधा है। जो विद्यार्थी कक्षा १२ पूरी नहीं करता, वह किसी भी गणना में नहीं आता — चाहे कितने भी महाविद्यालय खुल जाएँ। कक्षा ८ और १२ के बीच छूटा हर बच्चा २०३५ के लक्ष्य से स्थायी कटौती है।
यहीं बुनियादी शिक्षा का आँकड़ा भावुक नहीं, संरचनात्मक बन जाता है। असर २०२४ के अनुसार कक्षा ५ के ४८.७ प्रतिशत विद्यार्थी कक्षा २ का पाठ पढ़ सकते थे, किंतु केवल ३०.७ प्रतिशत साधारण भाग कर सके — और कक्षा ८ के आधे से अधिक विद्यार्थी आज भी भाग नहीं कर पाते।
जो बच्चा भाग किए बिना कक्षा ८ तक पहुँचता है, वह कक्षा ११ का गणित या विज्ञान नहीं झेल पाएगा। वह या तो छोड़ देगा, या उस संकाय में धकेल दिया जाएगा जो उसने चुना ही नहीं था।
२०३२ का उच्च शिक्षा संकट आज कक्षा ३ की गणित की कक्षाओं में तैयार हो रहा है।
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प्राचार्यों और आईक्यूएसी से एक विशेष निवेदन
फरवरी २०२५ से नैक ने दो-स्तरीय व्यवस्था लागू कर दी है — बाइनरी प्रत्यायन (मान्यता प्राप्त / अप्राप्त) और उसके बाद वैकल्पिक परिपक्वता-आधारित श्रेणीबद्ध स्तर, स्तर १ से स्तर ५ तक। ए++ से सी तक की पुरानी सीजीपीए श्रेणी समाप्त की जा रही है।
लगभग ९० प्रतिशत मान्यता प्राप्त संस्थान आज भी सीजीपीए-युग की श्रेणी रखते हैं, जिनकी अवधि २०२६-२७ में समाप्त हो रही है।
नई व्यवस्था संसाधनों से अधिक प्रक्रिया और परिणाम को महत्व देती है। जिन संस्थानों ने आईक्यूएसी को नियमित कार्य बनाया है, उनका संक्रमण सहज होगा। जिन संस्थानों में प्रत्यायन अंतिम वर्ष की दौड़ भर है, उन्हें कठिनाई होगी। यह दौड़ अब काम नहीं करेगी।
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अंतिम बात
एनईपी २०२० ने ढाँचा खड़ा करने में सफलता पाई है, और उसे चलाने की व्यवस्था जुटाने में संघर्ष किया है।
दृष्टि सही है — ५+३+३+४, बुनियादी साक्षरता का राष्ट्रीय अभियान, बहुविषयक लचीलापन, परिणाम मापने वाला प्रत्यायन। पहुँच बढ़ी है। बेटियाँ आगे हैं। बुनियादी शिक्षा सुधर रही है।
किंतु नीति केवल दस्तावेज़ नहीं होती। वह दस्तावेज़ है — साथ में धन, शिक्षक और ईमानदार मापन। तीनों में हमारी कमी गंभीर है, और वह कमी ठीक वहीं बढ़ रही है जहाँ निगरानी सबसे कमज़ोर है — राज्य विश्वविद्यालय, ग्रामीण ज़िले, एकल शिक्षक विद्यालय।
२०३५ में नौ वर्ष शेष हैं। अगला चरण और ढाँचे लिखने का नहीं हो सकता। वह ९.८३ लाख पद भरने, २.४ से ६ प्रतिशत तक पहुँचने, और आँकड़े तब प्रकाशित करने का होना चाहिए जब उनका अर्थ बचा हो।
नींव रख दी गई है। उस पर भवन बनाएँ या केवल उसे निहारते रहें — यह निर्णय इसी दशक का है।
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आपके संस्थान या ज़िले में नीति और ज़मीनी वास्तविकता के बीच सबसे बड़ा अंतर क्या दिखता है? मैं सुनना चाहूँगा।
— डॉ. नवल सिंह जैन
निदेशक, प्राज्ञ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, बिजयनगर
विस्तृत अंग्रेज़ी विश्लेषण: drnavalsinghjain.com
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स्रोत: अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण २०२२-२३ एवं २०२३-२४ (शिक्षा मंत्रालय, जुलाई २०२६); यूडाइस+ २०२४-२५ एवं २०२५-२६; असर २०२४ (प्रथम); नैक बाइनरी प्रत्यायन एवं एमबीजीएल ढाँचा, फरवरी २०२५; केंद्रीय बजट २०२५-२६; संसदीय स्थायी समिति का ३६८वाँ प्रतिवेदन; क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग २०२६।
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