“क्या यह परम वैभव आने की आहट है?”—या यह उस रास्ते से भटकने की शुरुआत है, जिसका स्वप्न दशकों से दिखाया गया?
एक सदी के संघर्ष और बलिदान के बाद अपेक्षा थी कि शासन में नैतिकता और पारदर्शिता स्पष्ट रूप से दिखाई देगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि जिन प्रवृत्तियों की कभी आलोचना होती थी, वे अब सुविधानुसार स्वीकार की जा रही हैं।
सबसे गंभीर स्थिति तब बनती है जब सत्ता के निकट होना ही योग्यता का मानक बन जाता है। इससे निष्पक्षता खत्म होती है और व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा आघात पड़ता है।
अवसर और संसाधन निष्पक्ष तरीके से नहीं, बल्कि वैचारिक निकटता के आधार पर बँट रहे हैं। जब संबंध योग्यता पर भारी पड़ने लगें, तो संस्थाएँ भीतर से कमजोर होने लगती हैं।
सत्ता पर आसीन होकर यदि जनसामान्य का अपमान और अवहेलना होने लगे, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मूल्यों का स्पष्ट पतन है। सत्ता का उद्देश्य सेवा होना चाहिए, प्रभुत्व नहीं। जब जनप्रतिनिधि ही नहीं घर वैभव छोड़कर निकले संन्यासी ही राजाओं की भांति व्यवहार करने लगे तब विश्वास की नींव ही हिलने लगती है।
यह केवल वर्तमान की समस्या नहीं, भविष्य की चेतावनी भी है। यदि अभी संतुलन बिगड़ रहा है, तो आगे चलकर निर्णय और अधिक केंद्रीकृत होंगे, और समाज की भूमिका सीमित होकर दर्शक भर रह जाएगी।
स्पष्ट है—“परम वैभव” नारों से नहीं आता। इसके लिए पारदर्शिता, जवाबदेही, निष्पक्षता और खुले संवाद की आवश्यकता होती है। इन मूल तत्वों के बिना कोई भी आदर्श केवल शब्द बनकर रह जाता है।
अब प्रश्न टालने का नहीं, सामना करने का समय है। यदि संकेत नकारात्मक हैं, तो उन्हें स्वीकार कर सुधार करना ही एकमात्र विकल्प है।
“यह कैसा परम वैभव है?”
क्या यही वह स्वप्न था,
जिसके लिए पीढ़ियाँ तपती रहीं?
उठो!
सिंहासन हिलाओ।
वरना इतिहास पूछेगा—
जब सत्य मर रहा था,
तब तुम कहाँ थे?
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